धर्मग्रंथों में वर्णित पौष शुक्ल अष्टमी से आरम्भ होकर पौष पूर्णिमा तक चलने वाले आठ-दिवसीय शाकंभरी नवरात्र का अंतिम और प्रमुख दिन शाकंभरी पूर्णिमा है; इसी तिथि को माता की जयंती मनाई जाती है। शाक = सब्ज़ी, अंभरी = धारण/प्रदान करने वाली; दुर्गा के इस रूप ने भुखमरी से त्रस्त जगत को वनस्पतियों, फल-अन्न से पोषण दिया—इसी से नाम शाकंभरी पड़ा। मार्कंडेय पुराण में वर्णित रक्तदंतिका, भीमा, भ्रामरी आदि रूपों में यह स्वरूप विशेष लोकप्रिय है। पौष मास कड़ी सर्दी का समय है; अनेक क्षेत्रों में इसी पूर्णिमा से माघ स्नान-दान आरम्भ माना जाता है, अतः इसे पौष पूर्णिमा भी कहा जाता है। मंदिरों में माँ को साग-सब्ज़ी, अनाज, फल, तिल व गुड़ से अलंकृत कर अर्चना की जाती है; भक्त परिवार-समृद्धि और आरोग्य की कामना करते हैं।