देवी शाकम्भरी, भगवती दुर्गा का ही हरित अवतार, हर तरह के शाकाहारी अन्न‑उत्पादों की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। उनका विस्तृत वर्णन ‘मूर्ति रहस्य’ (श्री दुर्गा सप्तशती का उपसंहार) में मिलता है, जहाँ वे शताक्षी तथा दुर्गा नाम से भी विख्यात हैं। मान्यता है कि माँ की एकनिष्ठ आराधना से साधक को अन्न‑धन, फल‑फूल और सर्वतो‑मुखी समृद्धि शीघ्र प्राप्त होती है। शिवालिक पर्वतमाला के घने जंगलों में, एक बरसाती नदी के तट पर, उनका प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठ स्थित है। स्कंद पुराण, मार्कण्डेय पुराण और भागवत पुराण—तीनों इस पावन स्थल का उल्लेख करते हैं। लोक‑विश्वास के अनुसार यहीं देवी स्वयंभू रूप में अवतरित हुईं और यही उनका नित्य विग्रह‑स्थान है। इस शक्तिपीठ के दर्शन मात्र से मन को शांति और जीवन में नव‑ऊर्जा का संचार होता है; इसलिए प्रतिवर्ष भक्तजन यहाँ उत्साहपूर्वक ‘शाकम्भरी नवरात्रि’ मनाते हैं।