माघ शुक्ल सप्तमी, जिसे रथ सप्तमी, अर्क सप्तमी या आरोग्य सप्तमी भी कहते हैं, सूर्य-उपासना की उस घड़ी को दर्शाती है जब देवाधिदेव उत्तरायण की पूर्ण तेजस्विता पर पहुँचे होते हैं। परंपरा मानती है कि इसी दिन सूर्य रथ के सात घोड़े नई गति पाते हैं और धरती पर आरोग्य, उर्जा व समृद्धि का संचार करते हैं। ब्रह्ममुहूर्त में स्नान के बाद, पूर्व दिशा की ओर मुख करके तांबे के कलश में कुमकुम-जल, लाल पुष्प व गुड़ घोलकर “ॐ घृणि सूर्याय नमः” के उच्चार से अर्घ्य अर्पित करें; ऐसा करने से रक्तसंचार सशक्त होता है और मानसिक उष्मा बढ़ती है। शास्त्र ‘एहि सूर्य सहस्रांशो…’ मंत्र के 108 जप को रोग-शोक विनाशक बताते हैं। ग्रामीण जन गुड़-रोटी या तिल-चिउड़ा सूर्य को दिखाकर बच्चों के ऊपर घुमाते हैं, मानो स्वर्णिम किरणों से उनका तन-मन कवचबद्ध हो रहा हो—और खेत-खलिहान में लहराती फसलें भविष्य की सम्पन्नता का वचन देती हों।