दक्षिण भारत, विशेषकर तमिल नाडु, में मनाया जाने वाला पोंगल, सूर्य के मकर राशि में प्रवेश (मकर संक्रांति) पर आरंभ होता है और तमिल पंचांग के ‘थाई’ माह के पहले चार दिनों तक चलता है। ‘पोंगल’ शब्द का एक अर्थ ‘उबालना’ है; अतः गुड़ और चावल से बने उफनते पकवान को सूर्यदेव को अर्पित करना ही इसकी केन्द्रीय रस्म है। पहला दिन भोगी पोंगल होता है, जब इन्द्रदेव से वर्षा के लिए आभार जताया जाता है। दूसरे दिन सूर्य पोंगल में खेतों की नई उपज से सूर्य की पूजा की जाती है। तीसरे दिन का मट्टू पोंगल कृषक-सखा नंदी बैल को समर्पित है, उसकी साज-सज्जा व आराधना के साथ उत्सव चरम पर पहुँचता है। अंतिम दिन कन्या पोंगल या ‘कनुम’ में महिलाएँ परिवार-कल्याण की कामना से काली मंदिर में विशेष अनुष्ठान करती हैं। उत्तर भारत की मकर संक्रांति की तरह, पोंगल भी खेतों में परिश्रम के फल का उल्लासपूर्ण उत्सव है, जो ऋतुओं के परिवर्तन और नई फसल की समृद्धि का संदेश देता है।