पितृपक्ष पूर्वज-स्मरण का पावन अवसर है। भाद्रपद पूर्णिमा के अगले दिन से आरंभ होकर आश्विन मास की अमावस्या (सर्वपितृ अमावस्या) तक चलने वाले इन सोलह दिनों में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान द्वारा पितरों को तृप्त किया जाता है। मान्यता है कि चावल, गौ-दूध, घी, गुड़ और मधु से बने पिंड अर्पित करने से वंश का कल्याण होता है, जबकि काला तिल, जौ, कुशा और श्वेत पुष्प से जल-तर्पण कर पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह काल शरद ऋतु के आगमन का संकेत भी देता है, सूर्य की तपन घटती है, धान की खेती सुनहराती है और घर-घर में दीपावली की तैयारियों की सुगंध फैलने लगती है। पूर्वज-स्मरण और ऋतु-परिवर्तन हमें जीवन में संतुलन और कृतज्ञता का संदेश देते हैं।