पौष मास हिंदू पंचांग का दसवाँ महीना है; हेमंत ऋतु की ठिठुरन अपने चरम पर रहती है और गंगा‑स्नान, तिल‑दान तथा सूर्य‑उपासना को विशेष पुण्यदायी माना जाता है। इसी महीने की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी ‘पौष विनायक चतुर्थी’ कहलाती है, जबकि पूर्णिमा के बाद वाली कृष्ण पक्ष की चतुर्थी ‘संकष्टी चतुर्थी’ कही जाती है। विनायक चतुर्थी पर श्री गणेश की आराधना दो बार—दोपहर तथा मध्याह्न—की जाती है। जन‑विश्वास है कि इस दिन व्रत रखने से बाधाएँ कटती हैं और सभी कार्य सफल होते हैं। पूजा‑विधि सरल है: ब्रह्ममुहूर्त में स्नान कर संकल्प लें, दोपहर में गणेश जी को दूर्वा अर्पित करें, 21 लड्डुओं का नैवेद्य चढ़ाएँ और ‘ॐ गं गणपतये नमः’ मंत्र की एक माला जपें। कहा जाता है कि गजानन का आशीष साधक को बल, बुद्धि और सफलता तीनों प्रदान करता है।