सबरीमला के भगवान अयप्पा मंदिर में मनाया जाने वाला ‘मण्डला पूजा’ पर्व धनुर्मास के ग्यारहवें अथवा बारहवें दिन, 41‑दिवसीय कठोर व्रत की पूर्णाहुति के रूप में आता है। यह व्रत मलयालम पंचांग के वृश्चिक मास के प्रथम दिन—जब सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करता है—से आरम्भ होकर सूर्य के धनु राशि में पहुँचने तक चलता है। संकल्प लेते समय भक्त शरीर पर चंदन का लेप लगाते हैं, अयप्पन् को प्रिय तुलसी या रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं और सत्य, ब्रह्मचर्य, शाकाहार तथा पवित्रता का कठोर पालन करते हैं। साधना‑काल में प्रतिदिन प्रातः स्नान, जप‑कीर्तन और सेवाभाव अनिवार्य माना गया है। समापन दिवस पर भगवान गणेश का आवाहन कर दीप‑आराधना, भजन‑कीर्तन तथा घी‑अभिषेक सम्पन्न होते हैं। मान्यता है कि इस अनुशासित तपस्या से मन‑तन शुद्ध होकर साधक को साहस, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का वरदान प्राप्त होता है।