पौष मास के अंतिम चरण में जब सूर्यदेव धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं, तब मकर संक्रांति का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन ऋतु परिवर्तन का संकेतक है, जब शीत ऋतु का प्रभाव कम होने लगता है और वसंत की आहट सुनाई देने लगती है। पौराणिक मान्यता है कि इस दिन सूर्यदेव अपने पुत्र शनि के गृह मकर में प्रवेश करते हैं, जिससे यह पर्व पिता-पुत्र के मिलन का प्रतीक भी बनता है। ज्योतिष के अनुसार, इस दिन सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाते हैं, जो आध्यात्मिक उन्नति और शुभ कार्यों के आरंभ का संकेत है। पुराणों में कहा गया है कि मकर संक्रांति पर गंगा या अन्य पवित्र नदियों में स्नान, तिल, गुड़, अन्न और वस्त्र का दान करने से समस्त पापों का नाश होता है और पुण्य की प्राप्ति होती है। यह पर्व धर्म, प्रकृति और परिवार, तीनों के बीच सामंजस्य की सुंदर अभिव्यक्ति है।