माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर पड़ने वाली मासिक दुर्गाष्टमी साधकों के लिए शक्ति–साधना का सुकुमार अवसर है। सर्द हवाएँ अब बसंत का संदेश सुनाने लगती हैं और घर-आँगन में महकते गेंदा-चंपा माँ दुर्गा के समक्ष अर्पित होते हैं। देवी के काली, भवानी, जगदम्बा और नवदुर्गा स्वरूपों की आरती के साथ धूप, घृतदीप, मौसमी फल-मिठाई तथा सिन्दूरी-श्वेत पुष्प चढ़ाए जाते हैं। परम्परा कहती है कि इस दिन का उपवास भय, निराशा और रोगों का शमन कर अक्षय सौभाग्य देता है। भक्तगण शांत मन से “या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता…” मंत्र का जप करते हुए माँ से साहस, विवेक और कृतित्व की याचना करते हैं। माना जाता है कि नियमित मासिक दुर्गाष्टमी-व्रत साधक को स्थिर आत्मबल, पारिवारिक मंगल और दीर्घकालीन शुभ फल प्रदान करता है—जैसे बसंती बयार हर डाल पर नई कोपलें जगा देती है।