माघ शुक्ल सप्तमी को मनाया जाने वाला माँ नर्मदा प्राकट्योत्सव शिव-कृपा से जन्मी इस दिव्य पुण्यसलिला का जन्मदिवस है। अमरकंटक की हरी भूरी पहाड़ियों से निकलकर पश्चिम की ओर बहती नर्मदा को मार्कण्डेय पुराण सहित महाभारत-रामायण तक ने मोक्षदायिनी कहा है। किंवदंती है कि शिवजी ने उन्हें अजर-अमर होने और मृत अस्थियों को भी शिव-स्वरूप कर देने का वरदान दिया; इसी कारण नर्मदा का हर पत्थर ‘शंकर’ रूप में पूजित होता है। उद्गम से सागरसंगम तक दोनोँ तटों पर 60 लाख 60 हज़ार तीर्थ बसते हैं—जहाँ स्नान, दीपदान और केवल दर्शन मात्र से भी जन्म-जन्मांतर के पाप क्षीण होते हैं। नर्मदा विश्व की एकमात्र नदी है जिसकी पूर्ण परिक्रमा—लगभग 3,000 किमी—आज भी हज़ारों श्रद्धालु नंगे पाँव करते हैं, मानो माँ की गोद में लौटते हुए मोक्ष का अमृत चख रहे हों।