कुम्भ संक्रान्ति उस पावन क्षण का संकेत है जब सूर्य मकर की सीमा लाँघ कुंभ राशि में प्रवेश करता है—शिशिर की ठिठुरन अब बसंत की धूप में घुलने लगती है। परम्परा है कि ब्रह्ममुहूर्त में किसी पवित्र नदी, सरोवर या अपने गृह-आंगन के कुण्ड में स्नान कर तन-मन शुद्ध करें, फिर पूर्वाभिमुख खड़े होकर तांबे के पात्र से “ॐ घृणि सूर्याय नमः” कहते हुए अर्घ्य अर्पित करें। घर के देवालय में घृतदीप प्रज्वलित कर आदित्य हृदय स्तोत्र, सूर्य कवच, सूर्य चालीसा या गायत्री मंत्र का जप किया जाता है; मान्यता है कि इससे तेज, आरोग्य और यश का संचार होता है। दिन का पुण्य पूर्ण करने हेतु तिल-गुड़, काले कम्बल, अन्न या घी का दान करना श्रेयस्कर माना गया है—कहा जाता है कि ऐसा करने से परिवार में दीर्घकालिक समृद्धि और शुभ ऊर्जा बनी रहती है।