माघ पूर्णिमा की स्वर्णिम प्रभा गुरु रविदास जयंती को चेतना का पर्व बना देती है। विश्वास है कि 1398 ई. की इसी तिथि, एक रविवार की भोर, सूर्य-चरणवत् आलोक लिए इस संत का जन्म हुआ—इसीलिये उनका नाम रविदास पड़ा। चमड़े का काम करने वाले साधारण परिवार में उत्पन्न होकर भी उन्होंने असाधारण विचार दिए; उनका दोहा “मन चंगा तो कठौती में गंगा” आज भी अंतर मन को झकझोर देता है। ‘बेगमपुरा’ उनकी वह कल्पना-भूमि है जहाँ लोभ, भेदभाव और दरिद्रता का नाम-निशान नहीं। संत वाणी ने धर्म-जाति की दीवारें प्रेम, समानता और सेवा के शब्द-बाणों से भेद कर समाज को नई दृष्टि प्रदान की। जयंती के दिन श्रद्धालु कीर्तन-सेवा, लंगर और स्वच्छता अभियानों के जरिये यह संकल्प दोहराते हैं—हर हाथ को काम, हर हृदय को सम्मान और हर जीवन को गरिमा मिले।