कार्तिक पूर्णिमा का प्रकाशमय उत्सव देव दीपावली कहलाता है। कथानुसार इस दिन भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का संहार कर त्रिपुरारी रूप धारण किया; इसी कारण इसे त्रिपुरारी पूर्णिमा भी कहते हैं। पुराणों में यह भी वर्णित है कि सृष्टि-रक्षा हेतु इसी तिथि पर विष्णु ने मत्स्य अवतार लिया। दीपावली के पन्द्रह दिन बाद आने वाले इस पर्व में स्नान-तर्पण तथा घी या तिल-तेल के दीपदान का शास्त्रीय विधान है। मान्यता है कि देवता स्वयं पृथ्वी पर उतरकर गंगा-तट पर दीप शृंखला सजाते हैं। काशी में गंगा घाटों की सीढ़ियाँ दीप-अर्चना से जगमगा उठती हैं, और पंचआरती की गूँज अन्धकार पर दिव्य प्रकाश की विजय का स्मरण कराती है। इस प्रकार देव दीपावली श्रद्धा, सौंदर्य और सांस्कृतिक ऐक्य का अनुपम संगम बनकर लोक-हृदय को आलोकित करती है।