श्रावण मास के चौथे सोमवार को रखा जाने वाला यह व्रत शिव-भक्ति का शिखर माना गया है। वर्षा ऋतु के इस पवित्र काल में, जब धरती हरियाली से सजी रहती है, साधक भगवान शिव के तंत्रेश्वर रूप की विशेष आराधना करते हैं। सूर्योदय के बाद कुश के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष-माला से ‘ॐ रुद्राय शत्रु संधाराय क्लीं कार्य-सिद्धये महादेवाय फट्’ मंत्र की ग्यारह माला जपने का विधान है। शिव-पूजन के साथ भगवान विष्णु का स्मरण भी कल्याणकारी माना गया है, जिससे दोनों देवों का संयुक्त अनुग्रह प्राप्त होता है। मान्यता है कि इस साधना से विघ्न, रोग और अकाल मृत्यु दूर होती है तथा आयु, आरोग्य और समृद्धि में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है।