माघ शुक्ल द्वादशी का दिन भीष्म द्वादशी के नाम से स्मरण किया जाता है—वह पुण्य घड़ी जब प्रतापी पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर देह-त्याग का वरण किया। महाभारत बताती है कि अष्टमी तिथि पर तीरों की शय्या स्वीकार कर चुके भीष्म ने, सूर्य के दक्षिणायन रहने से, योगबल से प्राण रोके रखे; उत्तरायण के उदय पर ही परमधाम प्रस्थान किया। परम्परा है कि आज के दिन श्रद्धालु भगवान श्रीकृष्ण का पूजन, तिल-जल तर्पण और दान कर भीष्म को कृतज्ञता अर्पित करते हैं। यह कथा याद दिलाती है कि शिखंडी पर शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा निभाते हुए भीष्म ने स्वेच्छा से अस्त्र छोड़े और धर्म-पालन के लिए शरशय्या वरण की। भीष्म द्वादशी का व्रत साधक को अडिग संकल्प, त्याग और धर्मनिष्ठा का आदर्श सिखाता है तथा कुल-कल्याण का आशीष देता है।