माघ शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाई जाने वाली भीष्म अष्टमी महाभारत के परम नायक, पराक्रमी भीष्म पितामह के निर्वाण-दिवस का स्मरण है। माना जाता है कि इसी तिथि पर उन्होंने शरशय्या पर योगबल से देह त्याग कर भगवत्-धाम की ओर प्रस्थान किया था। इस पावन दिवस पर इस्कॉन केन्द्रों से लेकर विष्णु-मंदिरों तक भव्य कीर्तन, पुष्प-अभिषेक और कथा-पाठ आयोजित होते हैं। श्रद्धालु प्रातः पवित्र नदियों में स्नान कर बिना सिले हुए श्वेत वस्त्र धारण करते हैं, फिर तिल-मिश्रित जल से ‘तर्पण’ अर्पित कर पितामह की आत्म-शांति और कुल-कल्याण की प्रार्थना करते हैं। उपवास, दान और तिल-तर्पण से संतान-सुख, पापकर्मों का क्षय तथा मोक्ष-प्राप्ति का शुभ आशीष मिलता है—यही संदेश भीष्म अष्टमी को युगों से साधकों को प्रेरित करता आया है।