आषाढ़ मास की पूर्णिमा पर गोपद्म व्रत रखा जाता है, जिसका मुख्य उद्देश्य भगवान विष्णु की आराधना है। देवशयनी एकादशी के बाद श्रीहरि चार माह के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं, पर इस दिन उनका स्मरण विशेष फल देता है। व्रती प्रातः स्नान करके चतुर्भुज विष्णु का ध्यान करते हैं—गरुड़ पर आरूढ़, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए, और साथ में माता लक्ष्मी की छवि मन में बसाते हैं। पूजन में तुलसी-दल, पीले पुष्प, घी का दीपक और खीर का नैवेद्य अर्पित किया जाता है। गोपद्म व्रत का एक महत्त्वपूर्ण अंग गौ-पूजन भी है; गौमाता को हल्दी-कुमकुम का तिलक लगाकर चूर्ण-हरी घास खिलाई जाती है। आस्था है कि इस विधि से घर में धन-धान्य, स्वास्थ्य और शांति का वर्धन होता है, तथा सन्तान को दीर्घायु और सद्गुणों का आशीष मिलता है।