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शुक्रवार — दिन के देवशुक्रवार के मंत्र, चालीसा, आरती और इस दिन से जुड़े सम्पूर्ण विधि-विधान।
एकादशी, अमावस्या, पूर्णिमा और मासानुसार पर्वों की सटीक तिथियाँ, समय और काउंटडाउन।
श्री महालक्ष्मी अष्टकम, ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः — हिन्दी अनुवाद और जप-गणना के साथ।
परिहार: दही खाकर यात्रा करें।
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बद्रीनाथ जी को सृष्टि का आठवां वैकुंठ कहा गया है, जहां भगवान विष्णु 6 माह निद्रा में रहते हैं और 6 माह जागते हैं। यहां भगवान बद्रीनाथ की मूर्ति शालग्राम शिला से बनी हुई, चतुर्भुज ध्यानमुद्रा में है। यहां नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है। मान्यता है कि जब भी केदारनाथ और बद्रीनाथ जी के कपाट खुलते हैं उस समय मंदिर में जलने वाले दीपक के दर्शन का विशेष महत्व होता है। 6 महीने तक बंद दरवाजे के अंदर भी यह दीप जलता रहता है, मान्यता है कि दैवीय शक्तियां इस दीपक को जलाए रखती हैं।
नासिक के पंचवटी में तपोवन नामक एक स्थल है, यह वही स्थान है जहां रावण की बहन शूर्पनखा ने श्री राम-लक्ष्मण के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा और देवी सीता को मारने का प्रयास किया। जब शूर्पनखा उपद्रव करने लगी तब लक्ष्मण जी नें, इसी स्थान पर शूर्पनखा की नाक काट दी थी। नाक को नासिका भी कहते हैं, नासिका यानी नाक काटे जाने की वजह से ही यह क्षेत्र नासिक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी इस स्थान पर इस घटना को चित्रित करती प्रतिमायें स्थापित हैं, जिन्हें पंचवटी में देखा जा सकता है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास बसा पंचवटी ही वह स्थान है जहां से रावण ने देवी सीता का हरण किया था। इस जगह पर वट के पांच वृक्ष हैं जिनके कारण इस जगह को पंचवटी कहा गया है। पंचवटी से लगभग 30 कि.मी. की दूरी पर ब्रह्मगिरि नाम का पर्वत है, इसी पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम हुआ है। पंचवटी में सुंदर नारायण नाम का एक मंदिर भी है, मंदिर के गर्भगृह में काले रंग की तीन मूर्तियां हैं, जिसमें बीच में भगवान नारायण और इनके आस-पास देवी लक्ष्मी की मूर्तियां हैं। इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि हर वर्ष 20 या 21 मार्च को मूर्तियों के चरणों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं।
जब भगवान शिव माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाने के लिए लेकर जा रहे थे, तब उन्होंने अपनी यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर कई विशेष स्थानों पर अपने प्रतीकों को त्यागा। अमरनाथ गुफा से लगभग 96 किलोमीटर दूर स्थित पहलगाम में उन्होंने कुछ समय विश्राम किया और यहीं अपने प्रिय नंदी जी को छोड़ दिया। आगे बढ़ते हुए, उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में स्थापित किया, माथे का चंदन चंदनवाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर छोड़ा, और अपने गले के शेषनाग को शेषनाग झील के समीप स्थापित किया। आज भी ये सभी स्थान अमरनाथ यात्रा के दौरान पड़ते हैं, और श्रद्धालु इनका दर्शन करते हुए भगवान शिव की उस पवित्र यात्रा को स्मरण करते हैं, जो उन्हें अमरकथा सुनाने के लिए लेकर गई थी। इस यात्रा के हर पड़ाव को शिव की दिव्यता और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है, जिससे यह संपूर्ण मार्ग भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
कामाख्या मंदिर में कोई भी मूर्ति नहीं है, यहां पर एक कुंड बना हुआ है जो हमेशा फूलों से ढका रहता है। इसी जगह पर एक समतल चट्टान के बीच बना विभाजन देवी की योनि को दर्शाता है। एक प्राकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीली रहती है। इस झरने के जल को काफी प्रभावकारी और शक्तिशाली माना जाता है, माना जाता है कि इस जल के नियमित सेवन से आप हर बीमारी से निजात पा सकते है।
हिंदू धर्म में सूर्यदेव, गणेशजी, माँ दुर्गा, शिव-शंकर और विष्णुजी को पंचदेव कहा गया है। किसी भी पूजा या धार्मिक अनुष्ठान में इन पंचदेवों का स्मरण अत्यंत आवश्यक है। प्रतिदिन इनका ध्यान करने से समस्त कार्य मंगलमय तरीके से पूरे होते हैं।
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