मंदिरों से संबंधित रोचक तथ्य(65)

तिरुपति बालाजी की प्रतिमा से जुड़ी एक अनोखी परंपरा है—हर गुरुवार को मूर्ति को सफेद चंदन से लेपित किया जाता है। जब यह चंदन धीरे-धीरे हटता है, तो भक्तों के सामने एक अद्भुत दृश्य प्रकट होता है—मूर्ति पर माता लक्ष्मी के दिव्य चिह्न उभर आते हैं। इस चमत्कारी दर्शन को देखकर श्रद्धालु आश्चर्यचकित रह जाते हैं और इसे भगवान वेंकटेश्वर की कृपा व उनकी अलौकिक शक्ति का प्रतीक मानते हैं। यही वजह है कि गुरुवार के दिन तिरुपति बालाजी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है।

तिरुपति बालाजी की प्रतिमा से जुड़ी एक अनोखी परंपरा है—हर गुरुवार को मूर्ति को सफेद चंदन से लेपित किया जाता है। जब यह चंदन धीरे-धीरे हटता है, तो भक्तों के सामने एक अद्भुत दृश्य प्रकट होता है—मूर्ति पर माता लक्ष्मी के दिव्य चिह्न उभर आते हैं। इस चमत्कारी दर्शन को देखकर श्रद्धालु आश्चर्यचकित रह जाते हैं और इसे भगवान वेंकटेश्वर की कृपा व उनकी अलौकिक शक्ति का प्रतीक मानते हैं। यही वजह है कि गुरुवार के दिन तिरुपति बालाजी के दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है।

बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं, मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में काशी में रहने वालों का पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।

बाबा विश्वनाथ और मां भगवती काशी में प्रतिज्ञाबद्ध हैं, मां भगवती अन्नपूर्णा के रूप में काशी में रहने वालों का पेट भरती हैं। वहीं, बाबा मृत्यु के पश्चात तारक मंत्र देकर मुक्ति प्रदान करते हैं। बाबा को इसीलिए ताड़केश्वर भी कहते हैं।

बाबा विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग काशी में गर्भगृह के ईशान कोण में स्थित है, जिसे ज्ञान और सभी कलाओं का मूल केंद्र माना जाता है। इसी कारण यहाँ तंत्र की दस महाविद्याओं का एक अद्भुत और रहस्यमय दरबार भी स्थापित है। मान्यता है कि ‘ईशान’ स्वयं भगवान शिव का ही एक स्वरूप है, जो समस्त कलाओं और विद्याओं के अधिपति माने जाते हैं। इस पावन स्थान पर आने वाले श्रद्धालु केवल शिव के दर्शन ही नहीं करते, बल्कि इस आध्यात्मिक ऊर्जा से भी जुड़ते हैं, जो यहाँ सदियों से प्रवाहित हो रही है।

बाबा विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग काशी में गर्भगृह के ईशान कोण में स्थित है, जिसे ज्ञान और सभी कलाओं का मूल केंद्र माना जाता है। इसी कारण यहाँ तंत्र की दस महाविद्याओं का एक अद्भुत और रहस्यमय दरबार भी स्थापित है। मान्यता है कि ‘ईशान’ स्वयं भगवान शिव का ही एक स्वरूप है, जो समस्त कलाओं और विद्याओं के अधिपति माने जाते हैं। इस पावन स्थान पर आने वाले श्रद्धालु केवल शिव के दर्शन ही नहीं करते, बल्कि इस आध्यात्मिक ऊर्जा से भी जुड़ते हैं, जो यहाँ सदियों से प्रवाहित हो रही है।

स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच से निकलने वाला रास्ता ये दर्शाता है कि मौत के बाद भी एक यात्रा होती है।

स्वर्ण मंदिर सरोवर के बीच से निकलने वाला रास्ता ये दर्शाता है कि मौत के बाद भी एक यात्रा होती है।

बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।

बाबा विश्वनाथ काशी में गुरु और राजा के रूप में विराजमान है। वह दिनभर गुरु रूप में काशी में भ्रमण करते हैं। रात्रि नौ बजे जब बाबा का श्रृंगार आरती किया जाता है तो वह राज वेश में होते हैं। इसीलिए शिव को राजराजेश्वर भी कहते हैं।

वेंकटेश्वर स्वामी यानी बालाजी की मूर्ति का पिछला हिस्सा हमेशा नम रहता है, यहाँ यदि ध्यान से कान लगाकर सुनें तो सागर की आवाज सुनाई देती है।

वेंकटेश्वर स्वामी यानी बालाजी की मूर्ति का पिछला हिस्सा हमेशा नम रहता है, यहाँ यदि ध्यान से कान लगाकर सुनें तो सागर की आवाज सुनाई देती है।

तिरुपति बालाजी मंदिर में वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर लगे हुए बाल उनके असली बाल हैं। ऐसा कहा जाता है कि ये बाल कभी उलझते नहीं है और हमेशा इतने ही मुलायम रहते हैं।

तिरुपति बालाजी मंदिर में वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर लगे हुए बाल उनके असली बाल हैं। ऐसा कहा जाता है कि ये बाल कभी उलझते नहीं है और हमेशा इतने ही मुलायम रहते हैं।

जगन्नाथ जी का महाप्रसाद बनाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, और प्रसाद लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर के बर्तन का प्रसाद पहले पकता है और इसी क्रम में निचे के बर्तनों का प्रसाद सबसे अंत में पकता है।

जगन्नाथ जी का महाप्रसाद बनाने के लिए सात बर्तन एक दूसरे के ऊपर रखे जाते हैं, और प्रसाद लकड़ी जलाकर पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में सबसे ऊपर के बर्तन का प्रसाद पहले पकता है और इसी क्रम में निचे के बर्तनों का प्रसाद सबसे अंत में पकता है।

राजस्थान के नागौर जिले में माँ काली का एक चमत्कारिक मंदिर है, यहाँ माँ के इस मंदिर को माँ भुवाल काली माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में माँ काली ढाई प्याला शराब ग्रहण करती हैं और बाकी बची मदिरा को भैरव जी पर चढ़ाया जाता है। यहाँ माँ के दो स्वरूपों माँ काली व ब्राह्मणी की पूजा की जाती है, जहां माँ ब्राह्मणी स्वरुप में इन्हें मिठाई चढ़ाई जाती है वहीँ, माँ काली को यहाँ मदिरा का भोग लगाया जाता है। चांदी के प्याले से पुजारी द्वारा ढाई प्याला मदिरा माँ को अर्पित की जाती है, जिसे माता स्वीकार करती हैं और प्याले में एक बूंद मदिरा भी बाकी नहीं रहती।

राजस्थान के नागौर जिले में माँ काली का एक चमत्कारिक मंदिर है, यहाँ माँ के इस मंदिर को माँ भुवाल काली माता मंदिर के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर में माँ काली ढाई प्याला शराब ग्रहण करती हैं और बाकी बची मदिरा को भैरव जी पर चढ़ाया जाता है। यहाँ माँ के दो स्वरूपों माँ काली व ब्राह्मणी की पूजा की जाती है, जहां माँ ब्राह्मणी स्वरुप में इन्हें मिठाई चढ़ाई जाती है वहीँ, माँ काली को यहाँ मदिरा का भोग लगाया जाता है। चांदी के प्याले से पुजारी द्वारा ढाई प्याला मदिरा माँ को अर्पित की जाती है, जिसे माता स्वीकार करती हैं और प्याले में एक बूंद मदिरा भी बाकी नहीं रहती।

राजस्थान की लोक कथाओं के अनुसार मामड़िया चारण समाज के एक दंपति नें संतान प्राप्ति के लिये वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित माँ हिंगलाज के सात बार पैदल दर्शन कर उनसे संतान प्राप्ति की विनती की थी। एक दिन माँ हिंगलाज ने स्वप्न में आ कर पूछा कि तुम्हें पुत्र चाहिये या पुत्री तब चारण ने माँ से विनती कर कहा की, हे माँ आप स्वयं ही हमारे घर पुत्री के रूप में जन्म लें। तब हिंगलाज माता की कृपा से चारण के घर सात पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया, इन्हीं में से एक आवड माँ थी, जिन्हें आज तनोट माता के नाम से जाना जाता है।

राजस्थान की लोक कथाओं के अनुसार मामड़िया चारण समाज के एक दंपति नें संतान प्राप्ति के लिये वर्तमान में पाकिस्तान के बलूचिस्तान में स्थित माँ हिंगलाज के सात बार पैदल दर्शन कर उनसे संतान प्राप्ति की विनती की थी। एक दिन माँ हिंगलाज ने स्वप्न में आ कर पूछा कि तुम्हें पुत्र चाहिये या पुत्री तब चारण ने माँ से विनती कर कहा की, हे माँ आप स्वयं ही हमारे घर पुत्री के रूप में जन्म लें। तब हिंगलाज माता की कृपा से चारण के घर सात पुत्रियों और एक पुत्र ने जन्म लिया, इन्हीं में से एक आवड माँ थी, जिन्हें आज तनोट माता के नाम से जाना जाता है।

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