मंदिरों से संबंधित रोचक तथ्य(65)
पंचवटी में कालेराम नामक एक अत्यंत सुन्दर मंदिर है, मंदिर की प्राचीन कथा के अनुसार पंचवटी के साधुओं ने राक्षसों से छुटकारा दिलाने के लिए प्रभु राम से प्रार्थना की थी। तब राम जी ने यहाँ अपना काला रुप धारण कर उनका वध किया था। इस मंदिर को पेशवाओं द्वारा बनवाया गया था, यहाँ प्रभु राम, माँ सीता और लक्ष्मण जी की काले रंग मूर्तियां स्थापित हैं। काले पत्थरों से निर्मित यह मंदिर 70 मीटर ऊंचा है और और 32 मीटर चौड़ा है, मंदिर का उपरी कलश 32 टन शुद्ध सोने का बना है। मन्दिर निर्माण में जिन पत्थरों का उपयोग किया गया है उन्हें पहले दूध में उबाल कर जांचा गया था।
नासिक के पंचवटी में तपोवन नामक एक स्थल है, यह वही स्थान है जहां रावण की बहन शूर्पनखा ने श्री राम-लक्ष्मण के समक्ष विवाह का प्रस्ताव रखा और देवी सीता को मारने का प्रयास किया। जब शूर्पनखा उपद्रव करने लगी तब लक्ष्मण जी नें, इसी स्थान पर शूर्पनखा की नाक काट दी थी। नाक को नासिका भी कहते हैं, नासिका यानी नाक काटे जाने की वजह से ही यह क्षेत्र नासिक के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आज भी इस स्थान पर इस घटना को चित्रित करती प्रतिमायें स्थापित हैं, जिन्हें पंचवटी में देखा जा सकता है।
नासिक के पंचवटी में सीता गुफा है, जिसमें भगवान राम, लक्ष्मण और सीता जी की मूर्तियां हैं। जब लक्ष्मण जी ने शूर्पनखा की नाक काट दी थी, तब 10,000 राक्षस भगवान राम और लक्ष्मण जी से लड़ने के लिये यहाँ आये थे। तब पंचवटी क्षेत्र, दंडकारण्य वन का हिस्सा हुआ करता था, माँ सीता के निवास के लिये इस गुफा को बनाया गया था। यह जंगल बहुत घना था, इसी कारण गुफा की पहचान के लिए यहाँ 5 बरगद के वृक्ष लगाये गए थे, इन वट वृक्षों के कारण ही इस स्थान का नाम पंचवटी पड़ा है। गुफा के अन्दर एक प्राचीन शिवलिंग भी है, जिसे माँ सीता द्वारा ही स्थापित किया माना जाता है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास बसा पंचवटी ही वह स्थान है जहां से रावण ने देवी सीता का हरण किया था। इस जगह पर वट के पांच वृक्ष हैं जिनके कारण इस जगह को पंचवटी कहा गया है। पंचवटी से लगभग 30 कि.मी. की दूरी पर ब्रह्मगिरि नाम का पर्वत है, इसी पर्वत से गोदावरी नदी का उद्गम हुआ है। पंचवटी में सुंदर नारायण नाम का एक मंदिर भी है, मंदिर के गर्भगृह में काले रंग की तीन मूर्तियां हैं, जिसमें बीच में भगवान नारायण और इनके आस-पास देवी लक्ष्मी की मूर्तियां हैं। इस मंदिर का निर्माण इस प्रकार किया गया है कि हर वर्ष 20 या 21 मार्च को मूर्तियों के चरणों पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं।
श्री रामकृष्ण परमहंस जी कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुरोहित थे, माँ काली के अनन्य भक्त रामकृष्ण परमहंस जी नें वैवाहिक जीवन से सन्यास ले लिया था। वे अपनी पूजा में पूरी तरह मग्न रहते और माँ काली से बात करते थे। इन्हें हर स्त्री में माँ काली ही दिखाई देती थीं, इसी कारण यह अपनी पत्नी शारदामणि जी को भी माँ कह कर पुकारने लगे थे। इनकी पत्नी इनके धर्म-मार्ग में बाधा नहीं बनना चाहती थी, इसी कारण इन्होनें अपने पति से वर्ष में एक बार दर्शन पाने की विनती की।
महाबलीपुरम का शोर मंदिर दक्षिणी भारत के सबसे पुराने पत्थर के मंदिरों में गिना जाता है और इसे 1984 में यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थल के रुप में घोषित किया गया था। शोर मंदिर में तीन मंदिर हैं जो एक दूसरे के समीप स्थित, भगवान शिव और भगवान विष्णु को समर्पित है। शोर मंदिर का मुख्य आकर्षण पाँच रथ या पंच पांडव रथ हैं, जिनमें से चार का नाम पांडवों के नाम पर रखा गया है और पाँचवां द्रौपदी रथ के रूप में जाना जाता है। कारीगरों के सौंदर्यवादी उत्कृष्टता के कारण इनमें से प्रत्येक रथ एक-दूसरे से अलग है।
जब भगवान शिव माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य सुनाने के लिए लेकर जा रहे थे, तब उन्होंने अपनी यात्रा के अलग-अलग पड़ावों पर कई विशेष स्थानों पर अपने प्रतीकों को त्यागा। अमरनाथ गुफा से लगभग 96 किलोमीटर दूर स्थित पहलगाम में उन्होंने कुछ समय विश्राम किया और यहीं अपने प्रिय नंदी जी को छोड़ दिया। आगे बढ़ते हुए, उन्होंने छोटे-छोटे अनंत नागों को अनंतनाग में स्थापित किया, माथे का चंदन चंदनवाड़ी में उतारा, अन्य पिस्सुओं को पिस्सू टॉप पर छोड़ा, और अपने गले के शेषनाग को शेषनाग झील के समीप स्थापित किया। आज भी ये सभी स्थान अमरनाथ यात्रा के दौरान पड़ते हैं, और श्रद्धालु इनका दर्शन करते हुए भगवान शिव की उस पवित्र यात्रा को स्मरण करते हैं, जो उन्हें अमरकथा सुनाने के लिए लेकर गई थी। इस यात्रा के हर पड़ाव को शिव की दिव्यता और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है, जिससे यह संपूर्ण मार्ग भक्तों के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
कामाख्या मंदिर में कोई भी मूर्ति नहीं है, यहां पर एक कुंड बना हुआ है जो हमेशा फूलों से ढका रहता है। इसी जगह पर एक समतल चट्टान के बीच बना विभाजन देवी की योनि को दर्शाता है। एक प्राकृतिक झरने के कारण यह जगह हमेशा गीली रहती है। इस झरने के जल को काफी प्रभावकारी और शक्तिशाली माना जाता है, माना जाता है कि इस जल के नियमित सेवन से आप हर बीमारी से निजात पा सकते है।